box-sizing: content-box; width: 100%; border: solid #5B6DCD 10px; padding: 5px;
Breaking News
recent

विश्व का एक ऐसा मंदिर जहा महादेव के अंगूठे की पूजा की जाती है।

 दोस्तों क्या आपको पता है। माउन्ट आबू पर्वत सृष्टि के रचिता देवाधि देव महादेव के अंगूठे पर स्थित है। जहा अचलेश्वर महादेव मंदिर धौलपुर, दिन में तीन बार रंग बदलने वाला शिवलिंग है। वहीं राजस्थान के माउंट आबू में स्थित अचलेश्वर महादेव मंदिर दुनिया का ऐसा इकलौता मंदिर है। जहां पर शिवजी की शिवलिंग नहीं बल्कि उनके पैर के अंगूठे की पूजा होती है। 


 

इस मंदिर में प्रवेश करते ही पंच धातु की बनी नंदी की एक विशाल प्रतिमा है, पूरे विश्व में नेपाल के पसुपतिनाथ मंदिर के बाद यह दूसरा ऐसा मंदिर है। जहाँ नंदी महाराज पंच धातु जैसे सोना,चाँदी, तांबा, पित्तल, जस्ता के मिश्रण से बनकर विराजमान है।जिसका वजन चार टन हैं। 

पौराणिक मान्यताओं में बताया जाता है कि ऐतिहासिक स्थल अचलगढ़ ईस्वी सन, 813 में अचलेश्वर महादेव मंदिर निर्मित किया गया था। शंकर पुराण के मुताबिक वाराणसी शिव की नगरी है। तो माउन्ट आबू भगवान शिव की उपनगरी है। क्योकि यहां पर भगवान शिव के 108 प्राचीन मंदिर है। एक पारम्परिक मान्यता के अनुसार, जहा आबू पर्वत इस वक्त स्थित है। वहाँ एक समय बोहत गेहरी ब्रम्हा खाई हुआ करती थी। जहा वशिष्ट ऋषि की गाय कामधेनु, एक बार घास चरते हुए ब्रह्म खाई में गिर गई, तो उसे बचाने के लिए मुनि ने सरस्वती गंगा का आह्वान किया तो, ब्रह्म खाई पानी से जमीन की सतह तक भर गई और कामधेनु गाय गोमुख पर बाहर जमीन पर आ गई। 

 


 इसे देखते हुए बार-बार के हादसे को टालने के लिए वशिष्ठ मुनि ने हिमालय जाकर उनसे ब्रह्म खाई को पाटने का अनुरोध किया। हिमालय ने मुनि का अनुरोध स्वीकार कर अपने प्रिय पुत्र नंदी व‌र्द्धन को जाने का आदेश दिया। अर्बुद नाग नंदी व‌र्द्धन को उड़ाकर ब्रह्म खाई के पास वशिष्ठ आश्रम लाया। आश्रम में नंदी व‌र्द्धन ने वरदान मांगा कि उसके ऊपर सप्त ऋषियों का आश्रम होना चाहिए एवं पहाड़ सबसे सुंदर व विभिन्न वनस्पतियों वाला होना चाहिए। वशिष्ठ ने वांछित वरदान दिए। उसी प्रकार अर्बुद नाग ने वर मांगा कि इस पर्वत का नामकरण उसके नाम से हो। इसके बाद से नंदी व‌र्द्धन आबू पर्वत के नाम से विख्यात हुआ। वरदान प्राप्त कर नंदी व‌र्द्धन खाई में उतरा तो धंसता ही चला गया, केवल नंदी व‌र्द्धन का नाक एवं ऊपर का हिस्सा जमीन से ऊपर रहा, जो आज आबू पर्वत है। जिसके बाद भी वह स्थिर यानि अचल नहीं रह पा रहा था, तब वशिष्ठ के विनम्र अनुरोध पर महादेव ने अपने दाहिने पैर के अंगूठे को पसार कर, इसे स्थिर किया यानी अचल कर दिया। तब यह अचलगढ़ कहलाया। इस अंगूठे के नीचे बने प्राकृतिक पाताल खड्डे में कितना भी पानी डालने पर खाई पानी से नहीं भरती। इसमें चढ़ाया जानेवाला पानी कहा जाता है यह आज भी एक रहस्य है। 



मंदिर के रहस्य:- 

इस मंदिर का रहस्य यही समाप्त नहीं हुआ, 9वे दशक में जब मंदिर को लूटने के इरादे से मोहम्मद गजनी पूरी सेना के साथ अचलेश्वर मंदिर पंहुचा तो उसे कुछ नहीं मिला।  तब यह नंदी की प्रतिमा सुनहरे रंग से चमकती दिखी तो उसे लगा, की इसी मूर्ति में अंदर सभी हीरे, जेवरात, सोने के सिक्के , आभूषण होंगे। गजनी की सेना ने नंदी के पैर में गोली मारी तो महादेव ने चमत्कार किया और नंदी के पैर से इतनी मधुमखिया, और भोवरे निकले जिसके कारण उसकी सारी सेना भाग खडी हुई। लेकिन मोहम्बद गजवी नहीं भागा।उसने अपनी गलती को स्वीकार करते हुए महादेव् की शिवलिंग से कहा में यहाँ लुटे गए सभी धातुओं को पिघलाकर आपको त्रिशूल अर्पित करूँगा। जिसे ठीक नंदी के पास खड़ा किया  गया है। विडीयो पसंद आया हो तो इस चैनल को लाइक करे शेयर करे।  एक और नई जानकारी के साथ  मिलते है आपको अगली वीडियो मे,  

कोई टिप्पणी नहीं:

Blogger द्वारा संचालित.