हनुमानजी ने माता वैष्णो के लिए काल भैरव से क्यों युद्ध लड़ा था
दोस्तो एक बार एक पहाड़ी पर एक सुंदर कन्या को देखकर भैरवनाथ उसे पकड़ने के लिए दौड़े। तब उस कन्या ने वायु रूप बदलकर त्रिकूटा पर्वत की ओर उड़ी। भैरवनाथ भी उनके पीछे पीछे उड़े।
तभी उस पहाड़ी पर हनुमानजी पानी की तलाश में वहा पहुंचे, और हनुमानजी को बोहत प्यास लगी हुई थी, तब हनुमानजी ने माता को देखा और उनसे पानी का आग्रह किया, तो माता ने धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर उसमे से एक जलधारा निकाली, जिसे बाण गंगा कहा जाता है।
जिसके बाद हनुमानजी ने अपनी प्यास बुझाई। और उस जल में माता ने अपने केश धोए। फिर वहा एक गुफा में प्रवेश कर, माता ने नौ माह तक तपस्या की। और माता ने हनुमान से कहा की जब तक में तपस्या करके वापस बाहर ना आऊ तब तक, किसी भी व्यक्ति को अंदर मत आने देना। बस फिर क्या था,
हनुमानजी" तो हे ही वचन के पक्के, वे बैठ गए गुफा के बहार पेहरा देने। और एक दिन जब भैरवनाथ वहां भटकते भटकते आये, तो एक साधु ने भैरवनाथ से कहा। कि तू जिसे" एक साधारण कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदंबा है, इसलिए उस महाशक्ति का पीछा करना छोड़ दे मुर्ख। भैरवनाथ ने साधु की बात नहीं मानी। माता के पीछे पड़ने का मकसद भैरव का मोक्ष प्राप्त करना था। जैसे ही उसने गुफा में प्रवेश करने की कोशिश की।
तो पहरा दे रहे हनुमानजी ने उसे कहा, यदि तुम्हे इस गुफा में प्रवेश करना है तो तुम्हे मुझसे युद्ध करना होगा। हनुमानजी ने जैसे ही युद्ध के लिए ललकारा, वैसे ही दोनों का भयंकर युद्ध हुआ। इनका युद्ध नो महीने तक चला था।
उस युद्ध का कोई अंत नहीं देखकर माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप धारण कर लिया, और माता ने गुफा से बहार आकार भैरवनाथ का वध कर दिया।
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